शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

Good Bye Prabhashji



हिंदी के वरिष्ट पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रभाष जोशी के देहावसान की खबर दुखदाई है .... उनसे लगभग एक साल पहले जयपुर में मिलना हुआ था जब हरिश्चन्द्र माथुर लोक प्रशासन संसथान के सभागार में उनका भाषण था. वह और नामवर सिंह जी एक ही गाडी में दिल्ली से आये थे  और किसी शादी में जाने की हड़बड़ी में उसी शाम वापस लौटना चाहते थे. प्रख्यात  विद्वान कलानाथ शास्त्री जी मेरे साथ थे और ज़ाहिर था नामवर सिंह जी से अलग बैठ कर चर्चा करने का लोभ मन में था, हम लोग सभागार से निकल कर उस गेस्ट हाउस मैं चले आये जहाँ हिंदी के दोनों बेहतरीन वक्ताओं - प्रभाष जी और नामवर जी का अस्थाई डेरा था. मैंने तभी कला प्रयोजन के शायद दो नए अंक उसी दिन प्रकाशित किये थे, प्रभाषजी ने उत्सुकतापूर्वक  न सिर्फ  उन्हें  बेहद पैनी और तारीफ़ भरी निगाह से देखा बल्कि बातचीत को छोड़ कर वह चाय पीना भूल कर वहीं 'कला-प्रयोजन' के अंक पढने लगे, यह कहते हुए " भैया ! नामवरजी तुम्हारे अंक छोडेंगे नहीं, क्यों ये शायद उन्हीं के लिए तुम लाये भी हो पर मैं तो जितना संभव है, उन्हें यहीं पढ़ लेना चाहूँगा!"

मैं शर्मिंदा था, क्योंकि पत्रिकाओं की एक एक प्रति ही साथ थी!

उन्होंने तभी यह भी कह कर हमें और शर्मिंदा कर दिया : "क्या आप मेरे लेख अपनी पत्रिका मैं छाप पाएँगे, जो कला संस्कृति से सम्बंधित अक्सर नहीं होते!"

मैंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि प्रकाशन मूलतः सांस्कृतिक प्रकृति का है और इतर विषय  खास तौर पर राजनीति और अर्थशास्त्र पर टिप्पणियां हम नहीं छापते....प्रभाष जी हँसे और  नामवर जी की तरफ शैतानी से देखते हुए कहने लगे "पर कला और साहित्य की राजनीति क्या कम राजनीति है ?"
खैर.... वह हमारी पहली या दूसरी मुलाकात थी, पर उनका लिखा मैं हमेशा बेहद ध्यान से पढ़ कर अक्सर उनकी विश्लेषण-क्षमता और तार्कितता के प्रति और प्रशंसा भाव में डूबता गया ..

इंदौर की वह जान और शान दोनों थे....अब जहाँ आज उन्हीं की जन्मभूमि और आरंभिक कर्मभूमि इंदौर में  प्रभाष जी का  अंतिम संस्कार किया जा रहा है, वह छोटी सी मुलाक़ात बरबस याद गई....और अपने ब्लॉग पर   एकाएक ये थोड़े से टूटे, बिखरे वाक्य भी.....
 उन्हें हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि ...

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

ATTENTION ALL ARTISTS




Dear Artist,

I am planning to bring out a special number of our bilingual quarterly art-journal 'Kala-Prayojan' http://kala-prayojan.blogspot.com/

featuring all known, less-known, unknown,upcoming,budding,aspirant Indian/International Artists (Painters/sculptors) (with their old as well as recent paintings). For this purpose, I am sending you the following questionnaire for consideration and response. Should I hope that you would be kind enough to go through it thoroughly. By replying suitably at your earliest convenience and thus helping our research team to publish significant material about you and your paintings, we sincerely hope to spread the message of global friendship through Art.

Regards,

Hemant Shesh

QUESTIONS FOR ARTISTS

1. Where did your schooling in Art take place? or you have picked up painting on your own. How did you incline towards fine arts?

2. As a student of Art, who were your contemporaries, who later became renowned artists?

3. Who were your teachers during your studies ? Did anyone/some ones did inspire your work at the initial stage as a student artist.

4. What were the major difficulties that you faced during becoming an artist and later while establishing yourself as a visual artist-in your country and then abroad.

5. Can you classify certain important significant landmarks in your long art-journey?

6. Who are the major artists, who have inspired you or your work and why?

7. Your paintings are a blend of inspirations gathered from various sources. Which culture has a greater impact on your art and why?

8. Do you wish to be underlined as a creative artist using 'multi-media' for your various forms of expression. What has to be your central concern when you take up multi-media experimention for your works? What is the significance of being experimental while working multi-media?

10. In many series of paintings some artists have blended the images of the East to those of the West, What should have been the thereof and how it bridges the occidental and oriental sensibilities??

11. Are you aware of the contemporary Art in India? What major difference do you feel between the Indian art scene today as compared to the contemporary art world of West?

12. Taking a global view of modern world-art, how do you rate major Indian artists and their art? Who are the Indian artists whose works you are familiar with?

13. Public-Art as an urbanization trend is picking up gradually in developing countries like India. What should be its aesthetic direction and dimensions? How the modern art can works literate common men's vision towards life and art?

14. What is your assessment about the recent boost in art-market of the world? Has this trend negatively influenced artists or the orientation of contemporary art. Are they becoming more and more 'commercial' insted of being professional?

15. How persons other than art-field have inspired your work and who are the chief personalities of philosophical, intellectual, literary and allied fields who have contributed to the shaping of your creative orientation?

16. What in your opinion is the creative correlation between tradition and modernity? Have some of your works given an evidence of such a co-existence?

17. What is the meaning of being an Indian near you, when for the past so many decades you are staying permanently outside India? Do you sometimes miss India and for what reasons? (This Question is addressed to Non Residential Indian Artists living abroad)

18. What is the latest that you are working on and when is your next solo/group show(s) scheduled and where?

19. Have you to say anything special on governmental patronage of fine arts, especially with reference to art institutions established for protection, Promotion and development of art and artists?

20. Have you to say anything or to show anything significant to your senior/ contemporary/budding / upcoming generation of new artists? please append choisest of your 8 recent works for consideration of publication.

दुनिया मैत्री से भरी हो इसलिए.....





मैंने इधर अखबार पढ़ना लगभग छोड़ सा दिया है : खून-खराबा, मार-काट, बलात्कार, गोलीकांड, ठगी , तस्करी , अवैध सम्बन्ध, देह-शोषण, अपहरण, आगजनी....


क्यों न हम दिन की शुरूआत प्रेम और मैत्री से करें?

http://rootsandwings.ning.com/ नाम का लिंक देखें: आप को बुरा नहीं लगेगा, अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों से सीधे संवाद में.... और यह दिन की सार्थक शुरुआत के लिए बेहतर विकल्प है : अखबार से बड़ा!

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

ज्योतिस्वरूप का जाना

भारतीय आधुनिक कला में अक्सर राजस्थान के चित्रकारों के योगदान को अलक्षित ही किया जाता रहा है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्योतिस्वरूप जिनका कल निधन हुआ, कला की इसी ओछी राजनीति के शिकार थे । वह सच्चे अर्थ में राजस्थान के पहले और मौलिक चित्रकार थेसन ६० के दशक में जब बंगाल स्कूल और यथार्थवादी कला का बोलबाला था , जोधपुर जैसी छोटी जगह से कर ज्योतिस्वरूप (१९३९-२००९) ने अपने आधुनिक सोच और नवाचार के बल पर तत्काल अपनी कला की तरफ़ सुधी समीक्षकों और प्रेक्षकों का ध्यान खींच लिया था और यह आकस्मिक नहीं था कि उनके काम की असाधारण मौलिकता से यहाँ के ही नहीं, भारतीय कला जगत तक के समकालीन कई चित्रकार बेहद प्रभावित हुए थे, जिनमे कँवल कृष्ण जैसे अपेक्षकृत वरिष्ठ कलाकर्मी भी थेदिल्ली में कुछ वक्त कँवल कृष्ण और देवयानी कृष्ण के निकट सान्निध्य में रह कर ज्योतिस्वरूप ने एक और नए माध्यम : सेरेमिक और बाटिक में महारत हासिल करते हुए कई सरकारी मंडपों और भवनों के लिए विशाल आकAar के सेरेमिक murals का निर्माण कियाशायद सन साठ और सत्तर क्दशक इस कलाकार का स्वर्णिम दौर था जब रंगों और रसायनों से निर्मित उनकी चित्र श्रंखला 'इनर जंगल' का प्रदर्शन भारत और फिलेडेल्फिया की कला दीर्घाओं में किया गयावह बेहद उत्सुक और मेहनती रचनाकार थे- माध्यम को लेकर किए गए उनके अनेक प्रयोग आज भी कला जगत में याद किए जाते हैंविज्ञानं का विद्यार्थी होने कि वजह से उन्हें रसायनों का गहरा ज्ञान था पर कोई औपचारिक डिग्री लिए बिना भी ज्योतिस्वरूप परा मनोविज्ञान, समकालीन साहित्य महत्वपूर्ण लेखन के अध्येता थे केवल वह taaza किताबों के बारे में गहरी दिलचस्पी रखते थे बल्कि अपने पडौस की किताबों की एक बड़ी दूकान से मुफ्त किताबें लाकर पढ़ पाना उनका विशेषाधिकार था क्यों कि बुक्स एंड बुक्स के मालिक सिंघवी भी मूलतः उसी जगह के थे जहाँ के ज्योतिस्वरूपअपने अन्तिम दिनों और वर्षों में वह घोर आर्थिक कठिनाई में रहे और केंद्रीय ललित कला अकेडमी की fellowship के अलावा उनके पास नियमित आमदनी का कोई स्रोत नहीं था पर एक अलबेले, संघर्षरत, अकेले, एकांतवासी और हर तरह से अकेले हो चुके ज्योतिस्वरूप अपने अन्तिम वक्त तक रचनाशील बने रहेमुझे याद है उन पर 'कला प्रयोजन' में मैंने लंबा आलेख लिखा था और उनके कई चित्र भी हमने प्रकाशित किए थे, जहाँ जहाँ अवसर मिला हम मित्र उनकी कला की अप्रतिमता की चर्चा भी सादर करते थे, पर क्रमशः उनसे मिलने के अवसर कम होते चले गएगोष्ठियों में जाना भी उन्होंने छोड़ diya tha , पर मेरे दफ्तर वह कई baar जाया करते थे

आज जब ज्योति स्वरुप जैसे कलाकार अपनी मौलिकता और सृजनात्मकता के बावजूद कला जगत की मुख्यdhaaraa से बाहर कर दिए गए हैं , मुझे पता नहीं शिखंडियों और दुर्योधनों से भरे इस कला मंच का क्या अंजाम होगा क्यों कि हम अपने बड़े और महत्वपूर्ण कलाकर्मियों की उपेक्षा कर के हम अपनी कला की अवमानना ही तो कर रहे होते हैंमें जल्दी ही अपने ब्लॉग पर उनकी चित्रकला के बारे में vistaar से लिखना कहूंगा.

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

प्रगतिशील लेखक संघ के लिए एक कवितानुमा जानकारी







यहाँ तीस नागा साधुओं ने जीवित भू-समाधि ली थी ठीक दो सौ अडसठ साल पहले लोग कहते हेँ इस मन्दिर के हर पूर्णिमा को सात बार परिक्रमा करके यहाँ से दो सौ इक्यावन गज दूर बने प्राचीन कुंड में नहाने से पुराने से पुराना चर्म-रोग ठीक हो जाया करता है.... यह काली मन्दिर  राजाजी द्वारा पुत्र-प्राप्ति के उपलक्ष्य में बनवाया गया था जहाँ की बावडी के पास शनिचर जी महाराज की छः सौ साल पुरानी सवा हाथ बड़ी मूर्ति है जिसके आगे खेत जोतते वक्त हल की ठोकर से निकला था नीलम का दो फुट ऊंचा वही शिवलिंग जिसकी पूजा एक हज़ार साल से राजगढ़ के किले वाले मन्दिर में होती आई है.... कोतवाली वाले भैरों जी की उधर बड़ी मान्यता है क्यों की भानगढ़ के पुराने किले से लेकर इसी मन्दिर तक जहाँ आप अभी खड़े हैं,  एक लम्बी  भूमिगत सुरंग थी जो बाद में अंग्रेजों ने बंद करा दी और जहाँ बुधवार के दिन दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को न्योतने आज भी दंडवत 'पर्कम्मा' करते हुए कोई दो सौ लोग तो आए ही हैं , ठीक इसी जगह के पास सदियों से मेघनाद का पुतला घास फूस और मिट्टी से बनाते थे यहाँ के कुम्हार जिसे ठाकुर साब का हाथी गिराया करता था विजय दशमी के दिन .....फाजूजी की धर्मशाला है ये, जहाँ घरेलू जानवरों को   रोगमुक्त हो जाने पर लाया जाता है यहीं पीपल के पास प्रेत बाधा दूर होती है और काले कम्बल वाले फ़कीर बाबा की मजार पर हर शुक्रवार को औरतों का साप्ताहिक मेला भी भरता है चमत्कारी बरगद का ये बड़ा पेड़ देख रहें हैं आप चरों तरफ़ मान्यता मांगने के लिए लपेटे गए उन हजारों धागों की तरफ़ निगाह डालिए जिस बरगद के किनारे बालाजी का ये मन्दिर है वहीं धर्मशाला के कुँए  में राम जी का नाम लेकर फेंके गए पत्थर भी पानी पर तैरते हैंशाम की आरती के बाद मौली बाँध कर इस पेड़ के ग्यारह चक्कर लगाइए पुराना पीलिया अपने आप ठीक हो जाएगावहां मन्दिर की इस शिला के नीचे लेटने से औरतों को माहवारी की पुरानी से पुरानी समस्या से छुटकारा मिलता हैवराह अवतार का चबूतरा और उसके पास वो देखिये रोजगारेश्वर महादेव जी का पुराना मन्दिर जहाँ हर अमावस्या की रात एक इच्छाधारी नाग आता है तालाब के किनारे वो जो भैरों जी की मूर्ति है वो भी कम चमत्कारी नहींपरुशुराम बाबा की समाधि के पास जिसके ऊपर बनी छतरी नमक का व्यापार करने वाले डीडवाना के बंजारों ने बनवाई थीइसे नाहर भाता भी कहते हैं क्यों की शिवानन्द जी महाराज ने यहीं पर एक शेर को बकरी की तरह मन्दिर के उस खम्भे से बाँध दिया था अपने तंत्र के ज़ोर परशेर की वो मूर्ति अब गंगासहाय जी के गाँव वाले मन्दिर में अब भी देख सकते हैं आपजहाँ चावंड माता की जोत पिछली सदी से आज भी जल रही है और रोज़ का कोई एक डेढ़ सेर देसी घी आरती और धूनी में लगता है कहते हैं न देने वाले भी श्रीनाथजी और पाने वाले भी श्रीनाथजी.... सब भगवान् की ही माया  । रामदेव जी के चबूतरे की तो आपने बात ही नहीं की .....पहले बच्चे के बाल यहीं पर दिए जाते हैं और सांप काटने पर दूर दूर से मरीजों को यहीं लाया जाता हैचरण पहाडी के ऊपर पांडवों की गुफा है जिसमें चार महीने गुप्त प्रवास किया था उन्होंने....उस जगह एक शिव मन्दिर और है जहाँ की जलहरी का पानी कहाँ जाता है कोई जानता तक नहीं! बावडी के पीपल के आगे महावतों की तराई के पास मनसा माता की ये मूर्ति धरती से अपने आप निकली थी /




बुधवार, 24 जून 2009

हिन्दी की लघु पत्रिकाएं और हमारे दयित्व








Expansion of electronic media and its popularity day by day, except the letters printed in a new generation of literary journalism about our attitude towards disobedience into Is. Literature to just one question for youth dislike serious Atmcintn is standing in front of us all: especially those editors who are connected by a small literary magazine editing!
The question Is What led to this difficult scenario of Hindi literary journalism of a higher mission Instead Remain as a going enterprise Yashvihin Is?
"Art - purpose 'of the upcoming issue, which is 51, some important magazine editors, we Hindi Hindi in its vision of the literary journalism experience and wrap up their concerns on the economics of small magazines many articles being published very soon are hopes will become tired right content. If you art - are willing, I purpose to read mail: hemantshesh@gmail.com Or even write any of us put the following links:


http:// Jagah Jaisee Jagah .blogspot.com /

शुक्रवार, 5 जून 2009

उडीसा यात्रा के दौरान लिए गए चित्र
















मार्च से मई के बीच लगातार उडीसा जाना होता रहा। देश के इस भूभाग की अपनी खूबसूरती है और इसके अपने दुःख। अभाव और गरीबी का तांडव जितना वहां है शायद और कहीं नहीं । पर कलिंग प्रदेश अपनी तरह की एक अजीब सुन्दरता समेटे हुए है। क्या पता ये चित्र हमारे देश के एक बेहद सम्भावना भरे राज्य के भविष्य की और संकेत करते हों ! कालाहांडी का चेहरा भी अब बदल रहा है ! एक ज़माने में यह अपनी दरिद्रता के लिए इतना कुख्यात था की बस पूछिए मत! माओवाद यहाँ की एक और समस्या है : यह जितनी राजनैतिक है, उस से ज्यादा आर्थिक-सामाजिक, पर इधर नए केंद्रीय कानून से क्या पता उडीसा को भी जल्दी छुटकारा मिल जाए और यहाँ के सीधे भले लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़ जायें!
















मंगलवार, 5 मई 2009

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का दुःख अपनी जगह बिल्कुल ठीक है


अपने मित्रों का लिखा पढ़ना ,खास तौर पर अपने प्रिय लेखकों को कहीं भी पढ़ना सुखद होता है। अभी दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का यात्रा वृत्त पढ़ा और जब उन्हें अपनी प्रतिक्रिया भेजी तो अमेरिका से मुझे मिली उनकी ये मेल :

"जब ये टिप्पणियां लिख रहा था तो मन में ऐसे ही कुछ विचार थे. मुझे हमेशा लगता है कि व्यावसायिकता बुरी ही नहीं होती, अच्छी भी होती है. यहां, पराये देश में घूमना सदा बेहतर अनुभव देता है, जबकि अपने देश में घूमते हुए हमेशा डर लगता रहता है। पर्यटन विभाग की उदासीनता और दृष्टि हीनता अपनी जगह है, और तमाम पर्यटन स्थलों पर पर्यटक को एक ही बार में लूट लेने की मानसिकता, दुर्व्यवहार, शिष्टता का अभाव, गन्दगी - ये सब चीज़ें बहुत आहत करती हैं। पिछले दिनों हम लोग बेटे बहू के साथ आमेर गए थे. वो जो पीछे से एक रास्ता है, कार वाला, उस रास्ते से. अगर किसी ने नरक न देखा हो तो एक बार उस रास्ते से गुज़र जाए. यह तमन्ना भी पूरी हो जाती है.. हमारे राज्य और शहर का सबसे नामचीन पर्यटन स्थल है आमेर, और वहां तक पहुंचने का रास्ता! हे राम! क्या किसी को भी यह नज़र नहीं आता? न पर्यटन विभाग को, न सरकार को, और न उन सब को जिनकी रोजी रोटी पर्यटकों की कृपा से चलती है ? जब यहां के पर्यटक स्थलों को देखते हैं तो यह सब याद आए बगैर नहीं रहता. आपने प्रतिक्रिया दी, बहुत अच्छा लगा. "

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

ज़मीन और आसमान के बीच





हिन्दी कथाकार और चित्रकार प्रभु जोशी का ४० से भी ज़्यादा जलरंग चित्रों का एकल प्रदर्शन मार्च २००९ में जवाहर कला केन्द्र जयपुर में आयोजित था। यह प्रदर्शनी जलरंग जैसे अपेक्षाकृत कठिन माध्यम पर चित्रकार की पकड़ और संलग्नता का प्रमाण है।
बहुत बड़े आकार में नहीं , किंतु चित्रावकाश में छोटे होते हुए भी प्रभु जोशी ( 1950) अपने रंग- बर्ताव की मौलिक रचनाशीलता से भू खंडों , भवनों, दृश्यों, और प्रकृति की जानी पहचानी दुनिया का कुछ कुछ नई तरह सामना करते हैं । उनके यहाँ पहाड़ सिर्फ़ पहाड़ नहीं, एक कहानी है । नदी, नाले, पत्थर और घर जैसे कोई कविता , जिसमें दृश्यों के पीछे और दृश्य छिपे हुए हैं। चट्टानों, दीवारों, वनस्पतियों और भवन-संरचनाओं को प्रभु जोशी ने जिस कौशल और अंतरंगता से चित्रवस्तु बनाया है, वह समकालीन सैरों, खास तौर पर जलरंग- संयोजनों के इलाके में एक नई सी घटना है, जिस बात की तरफ हमारा ध्यान बराबर जाता है, वे हैं - textures .......उनके लगभग हर काम में textures की मौजूदगी , जो जलरंग माध्यम पर कलाकर्मी के असाधारण नियंत्रण को दर्शाती है। बर्फ, लकडी, पत्थर और दीवारों के texture यहाँ अपने पुराने समूचे अकेलेपन में भी बेहद दर्शनीय हैं । यों नीला, बेंगनी और भूरा प्रभु जोशी के शायद ज्यादा प्रिय रंग हों पर इनके अलावा भी धूसर रंगतों की मौजूदगी चित्रवकाश को एक नया मर्म बराबर देती है। यहाँ प्रकाश और छाया की बहुतेरी आवृत्तियाँ हैं।

यह विविध रंगों और रंगतों का एक ऐसा सुघड़ और खूबसूरत माया लोक है जिसमें कुछ खास रंगों जैसे कहीं कहीं- लाल की उपस्थिति बेहद उत्तेजक और ध्यान खींचने वाली है। वह चित्र की प्राकृतिक द्विआयामी सीमा को त्रि-आयामी दृश्य-संभावना बनाना चाहते हैं, इसलिए मुख्य फलक पर आयी चीज़ों के अलावा उनकी दिलचस्पी पृष्ठभूमि के अंकन में - ख़ास तौर पर-मूल दृश्य के पीछे दिखती आकृतियों में भी उतनी ही गहरी है।
यहाँ भू-दृश्य, एक ऊंचे पहाड़ पर खड़े हो कर प्रकृति की सौंदर्य सत्ता को देखने की कोशिश जैसा रोमांचक ही है। रंगों के सघन इस्तेमाल के साथ फ्रेंच gwash - सफ़ेद के उपयोग में प्रभु जोशी को एक अलग महारथ हासिल है। यहाँ सफ़ेद अपनी वाचालता में बहुत मुखर होते हुए भी संयत नज़र आता है, वह दूसरे रंगों के प्रभाव भी गहरे करता है। वह समूची सरंचना को नया अर्थ और आलोक देता सफ़ेद है।
उनके चित्रों के बारे में कथाकार समीक्षक अशोक आत्रेय की यह टिप्पणी भी पढ़े जाने लायक है : " प्रभु जोशी की ये रचनाशील सीरीज़ लैंडस्केप चित्रों और मिनिएचर्स शैली को उनकी आधुनिक प्रभावशीलता में प्रस्तुत करती है । इन चित्रों में सफ़ेद रंग-परतों और अनियमित रंग चिप्पियों की वजह से अलग पहचान करवाते हैं ।"
पता नहीं चलता प्रभु जोशी का यह चित्रांकन असल में उनके कहानीकार का ही विस्तार है, या चित्रांकन उनके कहानीकार के लिए प्रेरणा - पर एक कथाकार की तरह वह अगर बार-बार हमें देखे जा चुके स्थानों , शहरों, घरों, बरामदों, मंदिरों, दालानों और जलाशयों से जोड़ते हैं, तो यों इसमें कुछ भी आकस्मिक या अनदेखा नहीं है । प्रभु जोशी पत्थर और पानी की याद बेहद अंतरंगता से करते हैं। प्रकटतः वह दृश्यों की खूबसूरती के ही चितेरे हैं और अपने चित्रों में प्रकृति के विविध मूड्स को बेहतरीन रूपाकार देने के लिए उत्सुक।
प्रभु जोशी के चित्रों की एक और याद रखने लायक बात - उनके चित्रों में मनुष्य की अनुपस्थिति है। उनका चित्रलोक रंगों रेखाओं या आकृतियों से ठसाठस भरा पूरा होने के बावजूद एक सुंदर एकांत की अनुगूंजें समेटे हुए है। इन रचनाओं में मनुष्य कहीं भी मौजूद नहीं है।

जयपुर में प्रभु जोशी की ये पहली एकल प्रदर्शनी थी । इसके तुंरत बाद प्रभु ने मुंबई में भी अपना एक और शो किया है। हमें उनकी कूची से कुछ और लगातार बेहतरीन देखते जाने की जायज़ उम्मीद बनी हुई है।

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मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो

Born: 28th December 1952 at Jaipur Education: MA in Sociology from University of Rajasthan, Jaipur, India Career: Served as Collector, Pratapgarh Married to Punam M.A., One Daughter  NEHA, One Son NIMISH     Writings and Publications:   Hundreds of Poems, criticism, short stories, articles, editorials, Reviews, Comments and columns relating to art and literature  contributed to periodicals, journals, magazines and newspapers all over the country. Regular publication since 1970. Have Published more than 16 BOOKS. Works included in  more than 14 other books. Poetry translated  and published into many Indian and foreign Languages. Has received some awards and honors including the Silver Medal from  the President of India. Prescribed Poet in Higher Secondary in optional  Hindi paper of Rajasthan Board of Secondary Education. Organized seven One-man-shows of Drawings and paintings . Member and office-bearer of many international and national philanthropic cultural & literary bodies. Has also done direction of a few documentary films, Voice -over and script writing for TV, Radio and cultural centres. Has organized and  participated in many international and  national seminars and artists-camps / writers’ workshops. Biography included in many international publications and world-level Who’s Whos. Some Prizes, Honors and Felicitations. Major Books Published:   1.       Jaari Itihaas Ke Viruddha, 1974 ( Long-Poem) 2.       Beswaad Hawayen ,1981 (Poet’s  own Monograph)  3.       Kripal Singh Shekhawat,1981 ( An artist’s monograph) 4.       Ghar-Baahar, 1982 (Poetry-Collection) 5.       Neend men Mohenjodaro,1988 (Poetry-collection) 6.       Vrikshon Ke Swapna,1988 (Poetry Collection) 7.       Ashuddha Saarang,1991 (Short Poems) 8.       Kasht Ke Liye Kshamaa, 1995 (Poetry-Collection) 9.       Kripayaa anyathaa Na Len, 1999 ( Long Poem) 10.    Aap Ko yah Jaan Kar Prasanntaa Hogi, 2001 (Poetry-Collection) 11.    Jagah Jaisee Jagah,2007 (Poetry-collection) 12. "Bahut Kuchh Jaisa Kuchh Naheen, 2008     13.  "Prapanch Saar Subodhnee" (Poetry-collection) 2009 Published Edited Books: ( March  2001-2007) 14.    Saundarya Shastra Ke prashna (on Aesthetics) 15.    Kalaa-Vimarsh ( Discourses on arts and literature) 16.    Bhaartiytaa Kee Dhaarnaa ( On concept of Indianness) 15.    Bhaartiya Kalaa-Roop ( On Indian Art-forms) 16.    Bhaartiya Rangmanch (On Indian Theatre) 17.    Kalaon Kee Moolya-Drishti ( On values of Art) 18.    Jaltee hui Nadi 2006 (Poetry-collection)   Honorary Founder- Editor:   “Kala-prayojana” Quarterly multi Arts and literary magazine for the west Zone Cultural Centre, Ministry of Human Resource Development, Govt. of India, Udaipur, since 1995.